रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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समुद्र मंथन के समय सबसे पहले भयंकर विष हलाहल निकला, जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। इसकी तीव्रता से सृष्टि नष्ट हो सकती थी। लेकिन देवताओं और असुरों की प्रार्थना करने पर भगवान शिव ने इसे पीकर अपने कंठ में धारण किया और सृष्टि को बचा लिया, इस विश से भगवान शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
कामधेनु दिव्य गाय मानी जाती है जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है। इसके दूध, घी और अन्य उत्पाद अत्यंत पवित्र माने गए। ऋषि-मुनियों के आश्रमों में इसका विशेष महत्व था। इन्हे समृद्धि, पोषण और दैवी कृपा का प्रतीक माना जाता है।
ऐरावत स्वर्ग के राजा इंद्रदेव का दिव्य हाथी है। यह विशाल, बलशाली और तेजस्वी माना जाता है। ऐरावत वर्षा, शक्ति और राजसत्ता का प्रतीक है। इसे देवताओं के वैभव और स्वर्गीय शक्ति का चिन्ह माना गया है।
उच्चैःश्रवा सात मुखों वाला दिव्य घोड़ा है। यह तेजवान और दिव्य घोड़ा सौंदर्य और शुद्धता का प्रतीक माना गया। स्वर्ग के राजा इंद्रदेव ने इसे अपनाया। यह राजसी वैभव और देवताओं की गति तथा शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
कौस्तुभ मणि अत्यंत तेजस्वी मणिरत्न है जो भगवान विष्णु जी के वक्षस्थल पर विराजमान है। यह दिव्यता, पवित्रता और अनंत शक्ति का प्रतीक है। यह मणिरत्न देवता और ब्रह्मांड की चेतना को दर्शाता है।
पारिजात स्वर्ग मे स्थापित पुष्पवृक्ष है जिसकी पुष्प की सुगंध अत्यंत मनोहर मानी जाती है। इसके फूल कभी मुरझाते नहीं। यह सौंदर्य, प्रेम और दिव्य आनंद का प्रतीक है। इसे इंद्रलोक{स्वर्ग} में स्थापित किया गया।
अप्सराएँ दिव्य नृत्यांगनाएँ थीं जो सौंदर्य, कला और संगीत की प्रतीक मानी जाती हैं। ये अप्सराएं स्वर्ग में देवताओं का मनोरंजन करती है। सुंदर अप्सराएँ नृत्य ,आकर्षण, कला और सृजनात्मकता का प्रतिनिधित्व करती हैं।
देवी लक्ष्मी माता समुद्र मंथन से प्रकट होकर भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनीं। वे धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी हैं। लक्ष्मी का प्रकट होना पूरी सृष्टि में संतुलन और शुभता का संकेत माना जाता है।
वारुणी दिव्य पेय (मदिरा ) की देवी मानी जाती हैं। यह देवताओं और असुरों के लिए आकर्षण का विषय बनी। यह भोग, आकर्षण और मोह का प्रतीक है, जिससे विवेक और संयम की परीक्षा होती है।
समुद्र से दिव्य शंख निकला, जिसे भगवान विष्णु जी ने धारण किया। शंख पवित्रता, विजय और शुभ आरंभ का प्रतीक है। धार्मिक अनुष्ठानों में शंखनाद वातावरण को पवित्र करने वाला माना जाता है।
धन्वंतरि भगवान विष्णु के अंशावतार हैं, जो आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं। वे अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। धन्वंतरि स्वास्थ्य, चिकित्सा और दीर्घायु के प्रतीक हैं। धन्वंतरि भगवान देवताओ को भी स्वस्थ रखते है !
अमृत {सोमरस }अमरता प्रदान करने वाला दिव्य रस है। इसे पाने के लिए देव-असुरों में लंबे समय तक संघर्ष हुआ। अमृत जीवन, ऊर्जा और देवत्व का प्रतीक है। इसके सेवन से देवता अमर हुए।
चंद्रमा देवता समुद्र मंथन से प्रकट होकर भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हुए। वे शीतलता, सौंदर्य और मन के प्रतीक हैं। चंद्रमा समय, भावनाओं और प्रकृति के चक्र को दर्शाते हैं।
कल्पवृक्ष इच्छा की पूर्ति करने वाला दिव्य वृक्ष है। यह स्वर्ग में स्थापित है। यह आशा, समृद्धि और दैवी वरदान का प्रतीक है। इसके नीचे मांगी गई कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
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