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                                                                                                                                           श्री गणेशाय नमः                                                                 श्रीजानकीवल्लभो विजयते                                                                      ...

गजेन्द्र मोक्ष का पाठ

गजेन्द्र मोक्ष की कथा का दृश्य, सरोवर में मगरमच्छ के साथ संघर्ष करता हाथी गजेन्द्र

 

🪔 गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र सम्पूर्ण पाठ 🪔 

🪷 श्री शुक उवाच 🪷

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥ 1॥ 

🌺 गजेन्द्र उवाच 🌺

💥ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
      पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ 2॥ 

💥यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
     योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥ 3॥ 

💥यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
     क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम ।
     अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
     स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥ 4॥ 

💥कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो
     लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
     तमस्तदासीद गहनं गभीरं
     यस्तस्य पारेभिविराजते विभुः ॥ 5॥ 


💥न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
     र्जन्तुः पुनः कोर्हति गन्तुमीरितुम ।
     यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
     दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ 6॥


💥दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं
     विमुक्त सङ्गा मुनयः सुसाधवः ।
     चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
     भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ||7 ||

💥न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
     न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
     तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
     स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ 8॥ 

💥तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेनन्तशक्तये ।
     अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ 9॥ 

💥नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
     नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ 10॥ 

💥सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
      नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ 11॥ 

💥नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
     निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ 12॥ 

💥क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
     पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ 13॥ 

💥सर्वेन्द्रियगुणदृष्टे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
     असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ 14॥ 

💥नमो नमस्तेखिलकारणाय
     निष्कारणायाद्भूतकारणाय ।
     सर्वागमाम्नायमहार्णवाय
     नमोपवर्गाय परायणाय ॥ 15॥ 

💥गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय
     तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
     नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
     स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ 16॥ 

💥मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
     मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोलयाय ।
     स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत
     प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ 17॥ 

💥आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
      र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय ।
      मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
      ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ 18॥ 

💥यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
      भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
      किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
      करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ 19॥ 

💥एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं
      वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
      अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
      गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥ 20॥ 

💥तमक्षरं ब्रम्ह परं परेश-
      मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।
     अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
     मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ 21॥ 

💥यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः
      नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ 22॥ 

💥यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
     निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।
     तथा यतोयं गुणसम्प्रवाहो
     बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥ 23॥ 

💥स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ
     न स्त्री न षन्ढो न पुमान न जन्तुः ।
     नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्न
     निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ 24॥ 

💥जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
     मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
     इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
     स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥ 25॥ 

💥सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं
     विश्ववेदसम विश्वात्मानमजं
     ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥ 26॥ 

💥योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
     योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोस्म्यहम ॥ 27॥ 

💥नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
      शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
      प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
      कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ 28॥ 

💥नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहन्धिया हतम ।
      तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोस्म्यहम ॥ 29॥ 

🌻श्री शुकदेव उवाच 🌻

💥एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
      ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः ।
      नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
      तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत ॥ 30॥ 

💥तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
     स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः ।
     छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-
     श्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ 31॥ 

💥सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
      दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम ।
      उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
      न्नारायणाखिलगुरो भगवन नमस्ते ॥ 32॥ 

💥तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
     सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
     ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
     सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥ 33॥ 


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