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रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण

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                                                                                                                                           श्री गणेशाय नमः                                                                 श्रीजानकीवल्लभो विजयते                                                                      ...

देवाजी पंडा की भक्ति और चमत्कार – श्री चतुर्भुज महाराज

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🪔"भगवान की अनंत कृपा और भक्त की भक्ति का अद्भुत दृश्य। इस दिन श्री चतुर्भुज स्वामी के बाल  शुभ्र हो गए, और देवाजी पंडा का हृदय प्रेम और आशीर्वाद से भर गया।"🪔 🌸 श्री देवाजी पंडा की कथा – उदयपुर के चतुर्भुज स्वामी मंदिर🌺 🌸 देवाजी पंडा की भक्ति और साधु जीवन💥 उदयपुर के समीप चतुर्भुज स्वामी का मंदिर है। श्री देवाजी पंडा उसमे पुजारी थे। वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे परंतु  पूजा पाठ बड़े भक्ति भाव, श्रद्धा और विधि -विधान से करते थे। एक दिन की बात है उदयपुर नरेश रात के समय मंदिर में आए। शयन आरती हो चुकी थी। भगवान को शयन  कराकर देवाजी ने भगवान के गले का पुष्पहार उतारकर अपने सिर पर रख लिया था और मंदिर बंद करके बाहर  आ रहे थे। इसी समय महाराणा वहाँ पहुँचे। 🌸 महाराणा के आगमन और पुष्पहार की घटना💥 दरवाजे पर अकस्मात महाराणा को देखकर देवाजी घबरा कर मंदिर में घुस गए और उन्हें पहनाने के लिए भगवान  की माला ढूंढने लगे। उस दिन दूसरी माला नहीं थी, अतः महाराणा नाराज ना हो, इसलिए देवाजी ने मस्तक पर  रखा हुआ पुष्पहार उतारकर बाहर जाकर महाराणा के गले में पहना दिया। कुछ सोचने का ...

गजेन्द्र मोक्ष का पाठ

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  🪔 गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र सम्पूर्ण पाठ 🪔  🪷 श्री शुक उवाच 🪷 एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥ 1॥  🌺 गजेन्द्र उवाच 🌺 💥 ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।       पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ 2॥  💥यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।      योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥ 3॥  💥यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं      क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम ।      अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते      स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥ 4॥  💥कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो       लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।      तमस्तदासीद गहनं गभीरं      यस्तस्य पारेभिविराजते विभुः ॥ 5॥  💥न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-      र्जन्तुः पुनः कोर्हति गन्तुमीरितुम ।      यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो      दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ 6॥ 💥दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं ...