रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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राजा पाण्डु को किन्दम ऋषि के श्राप के कारण संतान उत्पन्न करने का अधिकार नहीं था। तब माता कुंती को प्राप्त
वरदान से उन्होंने देवताओं का आवाहन किया। कुंती ने इन्द्र देव का स्मरण किया, और उनके तेज से अर्जुन का
जन्म हुआ।
इसी कारण अर्जुन को देवराज इन्द्र का पुत्र माना जाता है। जन्म से ही उसमें वीरता, तेज और धर्म का समन्वय था।
अर्जुन ने आचार्य द्रोणाचार्य से अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी।
वह गुरुकुल का सबसे प्रतिभाशाली शिष्य था। इसी कारण गुरु द्रोणाचार्य का सबसे प्रिय शिष्य था !
द्रौपदी स्वयंवर में मछली की आँख भेदने की कठिन परीक्षा अर्जुन ने ही जीती।
एकलव्य की कथा में गुरु दक्षिणा के कारण अर्जुन का श्रेष्ठ धनुर्धर होना सुरक्षित रखा गया।
🌸 पार्थ – पृथ्वी (कुंती) का पुत्र
🌸 धनंजय – धन जीतने वाला
🌸 किरिटी – इंद्र द्वारा दिया गया मुकुट धारण करने वाला
🌸 श्वेतवाहन – श्वेत घोड़ों वाला रथी
🌸 गुडाकेश – नींद पर विजय पाने वाला
🌸 सव्यसाची – दोनों हाथों से समान रूप से धनुष चलाने वाला
🌸 विजय – सदैव विजयी
🌸 बीभत्सु – अधर्म से घृणा करने वाला
🌸 फाल्गुन – फाल्गुन मास में जन्म
🌸 कपिध्वज – जिनके ध्वज पर हनुमान विराजमान हों
🌸 जिष्णु – पराक्रमी, विजेता
🌸 नर – नर-नारायण में नर अवतार
🌸 कौन्तेय – कुंती का पुत्र
🌸 कौन्तेयपुत्र – कुंतीनंदन
🌸 इंद्रपुत्र – इंद्र का पुत्र
🌸 कुरुनंदन – कुरु वंश का आनंद
🌸 भारतश्रेष्ठ – भरतवंश में श्रेष्ठ
🌸 धनुर्धर – महान धनुर्धारी
🌸 महाबाहु – विशाल भुजाओं वाला
द्रौपदी – पांचों पांडवों की पत्नी
सुभद्रा – श्रीकृष्ण की बहन का विवाह अर्जुन के साथ हुआ और इन दोनों से अभिमन्यु जन्मे
उलूपी – नागराज कन्या
चित्रांगदा – मणिपुर की राजकुमारी
वनवास काल में अर्जुन ने कठोर तप किया।
उन्होंने भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त किया।
इन्द्रलोक जाकर दिव्यास्त्र ग्रहण किए !
कुरुक्षेत्र युद्ध में अर्जुन का मन अपने स्वजनों को देखकर विचलित हो गया।
तब श्रीकृष्ण ने उसे श्री भगवद्गीता का उपदेश दिया।
कर्मयोग: कर्म करो, फल की चिंता मत करो
धर्म: अधर्म के विरुद्ध युद्ध करना ही धर्म है
भक्ति: जो करो उसे ईश्वर को समर्पण करो
गीता का उपदेश भगवान के श्रीमुख से सुनकर अर्जुन का सारा मोह दूर हो गया और उसमे युद्ध करने का साहस आया।
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अर्जुन ने दिग्विजय की।
राज्य स्थापित होने के बाद उसने शांति और धर्म का प्रचार किया।
जब पांडवों ने संसार त्यागने का निश्चय किया, अर्जुन भी उनके साथ हिमालय की ओर चले गए।
अहंकार के क्षीण अंश के कारण वह मार्ग में ही गिर पड़ा।
युधिष्ठिर ने बताया-
“अर्जुन को अपने पराक्रम का गर्व था, इसलिए वह आगे नहीं जा सका।”
🌷 गुरु और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास आवश्यक है
🪷 कर्म करते हुए अहंकार त्यागना ही मुक्ति है
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