रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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🎉 भक्ति काल में अनेक ऐसे महान भक्त हुए जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि "भक्ति किसी जाति, कर्म या
व्यवसाय की मोहताज नहीं होती। "ऐसे ही एक महान भक्त थे "सदना कसाई।'
🎉 सदना कसाई एक नगर में रहते थे। उनका पेशा "कसाई" का था। वे दिन रात जीवों का वध करके अपना
जीवनयापन करते थे।
🎉 समाज उन्हें पापी मानता था, पर उनके हृदय में कहीं न कहीं ''भगवान के प्रति आस्था भी ''छुपी हुई थी।
🎉 एक दिन उन्हे संतों का सत्संग सुनने को मिला। संतों के मुख से उन्होंने सुना
🎉 “भगवान कण-कण में हैं, सभी जीवों में परमात्मा का अंश विद्यमान हैं।”
🎉 इन वचनों ने सदना के हृदय को झकझोर कर रख दिया। उन्हें अपने कर्मों पर ग्लानि हुई।
🎉उनके अंदर "पश्चाताप ''की अग्नि जलने लगी ।
🎉 एक दिन पशु का वध करते समय उन्होंने पशु की ''आँखों में भय और पीड़ा "देखी।
🎉 उसी क्षण उन्हें अहसास हुआ कि :
🎉“जिसे मैं मार रहा हूँ, वह भी तो "परमात्मा का अंश ''है।”
🎉 ये सोचकर उनके हाथ काँपने लगे। उन्होंने अपना छुरा एक तरफ फैंक दिया और उसी दिन अपना कसाई
का कार्य छोड़ दिया।
🎉 सदना ने अपना जीवन {भगवान विष्णु }श्री कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया !
🎉 वे प्रतिदिन नाम-स्मरण करते थे
🎉 वे संतों की सेवा करते
🎉 वे सादा जीवन जीते
🎉 वे सभी प्राणियों पर दया करते
🎉 अब उनका हृदय पूर्णतः निर्मल हो गया।
🎉 कठोर तप, पश्चाताप और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने सदना कसाई को दिव्य दर्शन दिए।
🎉 कहा जाता है कि भगवान ने स्वयं उन्हें स्वीकार किया और उनके सभी पूर्व कर्मों को क्षमा कर दिया !
🎉 सदना कसाई को भक्ति परंपरा में एक महान भक्त माना गया।
🎉 उनका उल्लेख संत-कथाओं और लोक-भजनों में मिलता है।
🎉उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि :
पापी मनुष्य भी पवित्र बन सकता है
यदि हृदय में सच्ची भक्ति और पश्चाताप हो।
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