Ekadashi: King Ambrish’s Devotionएकादशी व्रत कथा राजा अंबरीष जी
राजा अंबरीषजी की कथा King Ambrishji Story
King Ambrish, a great devotee of Lord Vishnu, is remembered for his unwavering faith and devotion. Observing Ekadashi Vrat with utmost sincerity, he became the subject of a famous incident involving the sage Durvasa and Lord Vishnu’s Sudarshan Chakra. His story exemplifies how true devotion and humility are always protected by the divine.
** राजा अंबरीष जी की एकादशी व्रत निष्ठा की कथा**
राजा अंबरीषजी ने एक बार अपनी पत्नी के साथ श्री कृष्ण भगवान को प्रसन्न करने के लिए वर्ष की सभी एकादशी का व्रत का नियम किया ,वर्ष पूरा होने पर धूमधाम से पारण के दिन उन्होंने भगवान वासुदेव की पूजा की ,ब्राम्हणो को गोदान किया ,जब वे पारण करने जा रहे थे तब ही अचानक "दुर्वासा ऋषि " पधारे !
दुर्वासाजी का क्रोध
अंबरीषजी ने उन्हे भोजन का आग्रह किया तो उन्होंने स्वीकार कर लिया ओर यमुना तट पे स्नान को चले गए अब द्वादशी केवल एक घड़ी शेष थी, द्वादशी मे पारण ना करने से व्रत भंग होता ,ब्राम्हणो से पूछकर अंबरीषजी ने भगवान का चरणामृत लेकर पारण कर लिया उधर दुर्वासाजी को अपने तप से ये बात पता चल गई ,तभी उन्होंने अपने मस्तक से एक जटा उखाड़ ली जिससे कृत्या नाम की राक्षसी निकली ओर उसे अंबरीषजी को समाप्त करने के लिए भेज दिया !
राक्षसी कृत्या का भस्म होना
तब वह राक्षसी अंबरीषजी को मारने दौड़ी ,राजा वही निर्भय होकर खड़े रहे परंतु भगवान का" सुदर्शन चक्र "तो पहले से ही राजा अंबरीषजी की सुरक्षा मे लगा हुआ था ,उसने तुरंत राक्षसी कृत्या को भस्म कर दिया, ओर ऋषि दुर्वासाजी की समाप्त करने उनकी और दौड़ा !
दुर्वासाजी के पीछे सुदर्शन चक्र का भागना
अब दुर्वासाजी अपने को बचाने के लिए भागने लगे , वो दसों दिशाओ मे गए , पर्वतों मे , गुफाओ मे , समुद्र मे , सब जगह छिपने के लिए गए , परंतु "सुदर्शन चक्र " ने उनका पीछा नहीं छोड़ा ,आकाश , पाताल सब जगह गए ,ब्रम्हा जी , शंकर जी किसी ने उनको आश्रय नहीं दिया !
भगवान विष्णुजी के शरणागत
अंत मे वे भगवान विष्णु जी के पास जाकर उनके चरणों मे गिर पड़े , कि प्रभु आप ही मेरी रक्षा करे ! मैंने आपके भक्त का अपराध किया है ! तब भगवान विष्णु जी ने कहा कि मै स्वतंत्र नहीं हूँ, मै तो अपने भक्तों के वश मे हूँ , उन्होंने मेरी भक्ति करके मुझे जीत लिया है ! आप राजा अंबरीषजी के पास ही जाओ, उन्ही से क्षमा मांगों , वही तुम्हें शांति मिलेगी !
राजा अंबरीषजी से दुर्वासाजी का शाम मांगना
एक वर्ष के बाद दुर्वासाजी वापिस अंबरीषजी के पास आए ,और उनसे क्षमा मांगी, तब अंबरीषजी ने सुदर्शन चक्र को शांत किया, दुर्वासाजी ने कहा कि आज मैंने भगवान के दासों का महत्व देखा ,राजन मैंने तुम्हारे साथ ऐसा अपराध किया ,तब भी तुमने मेरा धर्म से कल्याण ही चाहा ,राजन तुम बड़े दयालु हो !
अंबरीषजी की उदारता
राजा अंबरीषजी ने बिना किसी अहम के उन्हे तुरंत क्षमा कर दिया अंबरीषजी ने बड़े सम्मान के साथ उन्हे भोजन कराया ,उनके चले जाने पर एक वर्ष के बाद अंबरीषजी ने वह अन्न का प्रसाद पाया !
अंबरीषजी का भगवान को पाना
राजा बहुत काल तक भगवान मे मन को स्थिर करने के बाद, अपने पुत्र को राज्य सौपकर वन मे चले गए ,वहाँ उन्होंने तप करते हुए भगवान को प्राप्त कर लिया !
विशेष = ऐसा कहा जाता है एकादशी के दिन जो इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसे भी एकादशी व्रत का फल प्राप्त होता है !
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King Ambrish was a devoted ruler who strictly observed Ekadashi Vrat, dedicating his life to Lord Vishnu. One day, the sage Durvasa visited him, seeking hospitality. Ambrish welcomed him and began offering food. But as per the rules of his Ekadashi fast, he had to break it at a specific time. When the time came, Ambrish took a sip of water before serving the sage.
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