रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से अत्यंत द्वेष करता था, क्योंकि भगवान विष्णु ने उसके भाई राक्षस हिरण्याक्ष
का वध किया था, बदला लेने के लिए उसने कठोर तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके उनसे वरदान
प्राप्त कर लिया कि वह :
⌚ न दिन में मरे न रात में
🏠 न घर के भीतर न बाहर
🧞 न मनुष्य से न पशु से
⚔️ न शस्त्र से न अस्त्र से
⛈️ न पृथ्वी पर न आकाश में
📜 ना ही साल के 12 महीनों मे
इस वरदान को पाकर वह खुद को अमर मान बैठा और सब जगह घोषणा करवा दी कि
“मैं ही भगवान हूँ।”
हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु गर्भवती थीं। उस समय उन्हें नारद मुनि का सान्निध्य मिला। नारद मुनि के
उपदेशों से गर्भ में ही प्रह्लाद के हृदय में भगवान विष्णु की भक्ति अंकुरित हो गई।
बालक प्रह्लाद जन्म से ही शांत,प्रसन्न मुद्रा, करुणामय और विष्णु-भक्त थे।
हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को असुर गुरुओं शंड और अमरक के पास शिक्षा के लिए भेजा।
एक दिन हिरण्यकश्यप ने पूछा
“बेटा, तुमने क्या सीखा?”
प्रह्लाद ने उत्तर दिया :
“सबसे उत्तम विद्या भगवान विष्णु की भक्ति है।”
यह सुनकर हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा। उसने गुरुओं को डाँटा, पर प्रह्लाद की भक्ति कम न हुई। वह
अपने सहपाठियों को भी भक्ति का मार्ग बताने लगा।
हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को भक्ति से हटाने के लिए अनेक अत्याचार किए
उसे ऊँचे पर्वत से गिराया
उसे विष पिलाया
उसे अग्नि में जलाने का प्रयास किया
उसे हाथियों से कुचलवाया
उसे सर्पों के बीच फेंक दिया
पर हर बार भगवान विष्णु ने अपने बाल भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
प्रह्लाद हर समय केवल यही कहता “नारायण, नारायण।”
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में
बैठने का प्रयास किया। परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका खुद ही भस्म हो गई। इसी घटना
की स्मृति में होलिका दहन मनाया जाता है।
एक बार क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा
तेरा भगवान कहाँ है ? जिसे तू हर समय याद करता है बोल कहाँ है वो ?
तब प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि पिताजी भगवान सब जगह है !
“वे हर जगह विधमान हैं पिताजी।”
हिरण्यकश्यप ने खंभे की तरफ इशारा करके कहा कि इसमे तेरा भगवान है ?
प्रह्लाद ने कहा : हाँ पिताजी अवश्य इस खंबे मे भी है !
तभी उस खंभे से भगवान नरसिंह प्रकट हो गए !
ब्रम्हा जी के वरदान के अनुसार भगवान नृसिह जी
🧞मनुष्य शरीर मे थे पर उनका मुँह सिंह का था
⏲️ उस समय न दिन था न रात थी
भगवान ने उसे अपनी अपनी जांघ पे रख लिया
⛈️ ना वह पृथ्वी थी ना ही आकाश
भगवान उसे लेकर घर की देहरी पर बैठ गए
🏠ना वह घर के भीतर न बाहर था
भगवान ने उसका पेट अपने तेज नाखून से फाड़ दिया
⚔️ ना वह अस्त्र थे ना शस्त्र
उसे मारने के लिए भगवान ने 13 वे महीने का आरंभ किया जो 3 साल बाद आता है पुरुषोत्तम मास
भगवान ने संध्या के समय हिरण्यकश्यप को अपनी जाँघों पर रखकर
⏲️ अपने नाखूनों से उसका वध कर दिया उस समय ना दिन था ना रात
इस प्रकार भगवान ने ब्रम्हा जी के वरदान के अनुसार हिरण्यकश्यप का वध किया और अपने भक्त की रक्षा की !
भगवान नरसिंह ने प्रह्लाद को वर माँगने को कहा। प्रह्लाद ने कहा
“प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए
बस मेरे हृदय में आपकी भक्ति बनी रहे।”
भगवान ने प्रसन्न होकर उसे महान भक्त घोषित किया
और धर्मपूर्वक राज्य करने का आशीर्वाद दिया।
प्रह्लाद ने जीवन भर प्रभु की भक्ति की और धर्म का पालन किया।
अंत में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया !
अतिसुन्दर कहानी
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