रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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बहुत समय की बात है, द्वापर युग में, जब धरती पर धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष चल रहा था। उसी समय की यह पवित्र कथा है।
कालिया नाग एक बहुत ही विषैला और शक्तिशाली सर्प था, जो यमुना नदी में रहता था। उसके ज़हर की वजह से पूरा यमुना नदी का पानी जहरीला हो गया था। वहाँ कोई भी जीव-जंतु, पशु-पक्षी या इंसान नहीं जा सकता था क्युकी उसके जहरीले वातावरण मे सांस लेना मुश्किल हो गया था जीव मर रहे थे ! पूरा वातावरण अस्वस्थ और डरावना बन चुका था।
गोकुल और वृंदावन के लोग बहुत परेशान थे, क्योंकि यमुना नदी उनके जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा थी।
यमुना नदी का पानी धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा था। पेड़-पौधे मुरझा रहे थे, मछलियाँ मर रही थीं और आसपास का जीवन संकट में था। यह सब कालीय नाग के ज़हर और उसके अहंकार की वजह से हो रहा था।
लोगों में डर था कि अगर कोई उसे नहीं रोकेगा तो पूरी प्रकृति नष्ट हो जाएगी।
तभी वहाँ भगवान कृष्ण आए वे जानते थे कि यह केवल एक सर्प से लड़ाई नहीं है, बल्कि बुराई और अहंकार के खिलाफ संघर्ष है।
कृष्ण ने यमुना नदी में छलांग लगाई और सीधे कालीय नाग के फन पर चढ़ गए। यह देखकर सभी लोग डर गए, लेकिन कृष्ण शांत थे।
कृष्ण ने अपने दिव्य पराक्रम से कालीय नाग को पराजित किया। उन्होंने उसके कई फनों पर खड़े होकर नृत्य किया, जिससे उसका अहंकार टूट गया। यह दृश्य बहुत अद्भुत और दिव्य था।
कालीय नाग को समझ आ गया कि वह भगवान से नही जीत सकता वह केवल शक्ति के अहंकार में अंधा हो गया था। उसने भगवान से क्षमा मांगी !
कृष्ण ने कालीय नाग को मारा नहीं, बल्कि उसे क्षमा कर दिया। लेकिन उसे आदेश दिया कि वह यमुना छोड़कर समुद्र में चला जाए, ताकि किसी को नुकसान न हो।
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान कृष्ण केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि करुणा, प्रेम और धर्म के रक्षक थे। उन्होंने कालीय नाग को हराकर यह संदेश दिया कि सच्ची शक्ति वही है जो दूसरों की रक्षा करे।
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