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                                                                                                                                           श्री गणेशाय नमः                                                                 श्रीजानकीवल्लभो विजयते                                                                      ...

सच्ची मित्रता की कथा

श्रीकृष्ण अपने प्रिय मित्र सुदामा के चरण धोते हुए, पास में रुक्मिणी जी पंखा झल रही हैं, दिव्य महल का दृश्य
 

कृष्ण सुदामा की मित्रता  

सुदामा जन्म से ही दरिद्र थे।
श्री कृष्ण जब अवन्ती में महर्षि संदीपनी के यहाँ शिक्षा प्राप्त करने गए, तब वहीं श्रीकृष्ण से सुदामा की मित्रता हुई।

कृष्ण तो कुछ थोड़े से ही दिनों में वेद-वेदांग, शास्त्र और सभी कलाओं की शिक्षा पूर्ण करके चले आए और वे द्वारकाधीश हो गए।

सुदामा की शिक्षा पूरी हुई तब वे भी अपनी जन्मभूमि लौट आए। विवाह करके उन्होंने भी गृहस्थाश्रम स्वीकार किया।

सुदामा की दरिद्रता 

एक टूटी-फूटी झोपड़ी, टूटे-फूटे दो-चार बर्तन और लज्जा को ढकने के लिए कुछ मैले चिथड़े — बस इतनी ही गृहस्थी थी सुदामा की!

जन्म से सरल, संतोषी सुदामा किसी से कुछ मांगते नहीं थे। जो कुछ बिना मांगे मिल जाए, भगवान को अर्पण करके उसी पर उनका और पत्नी का जीवन निर्वाह होता था।

प्रायः दोनों पति-पत्नी को उपवास रखना पड़ता था। दोनों के शरीर क्षीण, कंकाल-प्राय हो रहे थे।

सुदामा की पत्नी सुशीला संतोषी, साध्वी और पतिपरायणा थी, किन्तु जब उसके दुबले पति को उपवास रखना पड़ता तो उसे अपार दुख होता था।

एक बार उसने डरते-डरते स्वामी से कहा —

“स्वामी! ब्राम्हणों के परम भक्त भगवान श्रीकृष्ण आपके मित्र हैं। आप एक बार उनके पास जाइए। आप कुटुंबी हैं, उनसे सहायता मांगिए। दरिद्रता के कारण क्लेश पा रहे हैं, अवश्य आपको प्रचुर धन देंगे।

मैं जानती हूँ कि आपके मन में रत्ती भर भी इच्छा नहीं है, पर आप कुटुंबी हैं। इस प्रकार कैसे निर्वाह होगा?”

पत्नी ने बहुत आग्रह किया।

सुदामा ने सोचा — श्रीकृष्णचंद्र के दर्शन हो जाएं, यह तो परम लाभ की बात है! परंतु मित्र के घर खाली हाथ कैसे जाऊँ?

किसी प्रकार ब्राम्हणी किसी पड़ोसिन से चार मुट्ठी रूखे चिउरे मांग लाई और उनको एक चिथड़े में बांधकर दे दिया। वह पोटली बगल में दबाकर सुदामा चल पड़े द्वारका की ओर।

कई दिनों की यात्रा करके सुदामा द्वारका पहुँचे। तब वहाँ का ऐश्वर्य देखकर हक्के-बक्के रह गए।

एक नागरिक ने श्रीकृष्ण का भवन दिखा दिया। ऐसे कंगाल, चीथड़े लपेटे, मैले-कुचैले ब्राम्हण को देखकर द्वारपाल को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके स्वामी ऐसे ही दीनों के अपने हैं, यह उसे पता था।

उसने सुदामा को प्रणाम किया, परंतु जब सुदामा ने अपने को श्रीकृष्ण भगवान का मित्र बताया, तब वह चकित रह गया कि यह कंगाल अपने को द्वारकाधीशजी का मित्र कह रहा है!

आखिरकार नियमानुसार सुदामा जी को द्वार पर ठहराकर द्वारपाल आज्ञा लेने भीतर चला गया।

भगवान श्रीकृष्ण त्रिभुवन के स्वामी अपने भवन में शय्या पर बैठे थे। श्री रुक्मिणी जी भगवान को भोजन परोस रही थीं।

तभी द्वारपाल ने भूमि पर मस्तक रखकर प्रणाम किया और कहा —
“एक फटे चिथड़े लपेटे, नंगे सिर, नंगे बदन, शरीर मैला-कुचैला, बहुत ही दुर्बल ब्राम्हण द्वार पर खड़ा है। पता नहीं वह कौन है और कहाँ का है?

बड़े आश्चर्य से चारों ओर देखता है, अपने को प्रभु का मित्र कहता है, प्रभु का निवास पूछता है और अपना नाम ‘सुदामा’ बताता है।”

श्रीकृष्ण की सखा भक्ति 

“सुदामा” यह शब्द कान में पड़ा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जैसे सुध-बुध खो दी। मुकुट धरा रह गया, पटका भूमि पर गिर गया। चरणों में पादुका नहीं, वे व्याकुल होकर दौड़ पड़े!

द्वार पर आकर दोनों हाथ फैलाकर सुदामा को इस प्रकार हृदय से लगा लिया, जैसे चिरकाल से खोई हुई निधि मिल गई हो।

सुदामा और श्रीकृष्ण दोनों की आँखों से अश्रु बहने लगे। कोई एक शब्द तक नहीं बोला। नगरवासी, रानियाँ, सेवक — सब चकित होकर देखते रह गए।

देवता आकाश से पुष्पवर्षा करने लगे और आज सुदामा के सौभाग्य की प्रशंसा करने लगे।

श्रीकृष्ण सुदामा को लेकर अपने भवन में पधारे। सखा को उन्होंने अपने दिव्य पलंग पर बिठाया। स्वयं उनके पैर धोने लगे।

“ओह! मेरे सखा के पैर इस प्रकार छाले पड़े हुए... इतनी दरिद्रता, इतना कष्ट भोगते हैं!”

ये विप्रदेव! हाथ में सुदामा का चरण लेकर कमललोचन अश्रु गिराने लगे और उन्हीं अश्रुओं से सुदामा जी के चरण धुल गए।

रुक्मिणी जी का भाव 

रुक्मिणी जी ने भगवान की ये दशा देखकर अपने हाथों सुदामा के चरण धोए। द्वारकेश ने यह चरणोदक अपने मस्तक पर छिड़का, तमाम महलों में छिड़कवाया।

तब दिव्य गंधयुक्त चंदन, दूब, अगुरु, कुमकुम, धूप, दीप, पुष्पमाला आदि से विधिपूर्वक सुदामा जी की भगवान ने पूजा की। उन्हें नाना प्रकार के पकवानों से भोजन कराके तृप्त किया। आचमन कराके पान खिलाया।

भोजन कराने के बाद रुक्मिणी जी पंखा झलने लगीं। श्रीकृष्ण ने उनसे गुरुगृह में रहने की चर्चा की, घर की कुशल पूछी।

सुदामा बोले —
“देवदेव! आप तो जगतगुरु हैं, आपको भला गुरुगृह जाने की आवश्यकता कहाँ थी! यह तो मेरा सौभाग्य था कि मुझे आपका साथ मिला। आपका गुरुगृह अध्ययन तो एक लीलामात्र था।”

हँसते हुए श्रीकृष्ण ने पूछा —
“आप मेरे लिए क्या भेंट लाए हैं?”

इस पर सुदामाजी सकुचाकर चुप रह गए।

अंतर्यामी सब कुछ जान गए कि ये मेरा निष्काम भक्त है। इसे कुछ नहीं चाहिए, पर फिर भी मैं इसे इतना दूँगा, जिसे पाने के लिए देवता भी सदा तरसते हैं।

चिउरे वाला प्रसंग 

प्रभु बोले —
“यह क्या है! भाभी ने मेरे लिए जो कुछ भेजा है, उसे आप छिपाए क्यों जा रहे हैं सुदामा?”

यह कहते हुए श्रीकृष्ण ने सुदामा से पोटली खींच ली। पुराना जीर्ण वस्त्र फट गया, चिउरे बिखर पड़े।

भगवान ने एक मुट्ठी भरकर मुँह में डालते हुए कहा —
“मित्र! यही तो मुझे प्रसन्न करने वाली भेंट है। ये चिउरे मेरे साथ समस्त विश्व को तृप्त कर देंगे।”

“बड़ा मधुर, बहुत स्वादिष्ट!”

इस प्रकार प्रशंसा करते हुए जब दूसरी मुट्ठी भरी, तो रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ते हुए कहा —
“बस कीजिए प्रभु! सब प्रकार की संपत्ति तो एक मुट्ठी चिउरे से ब्राम्हण को मिल चुकी है। दूसरी मुट्ठी से अब आप और क्या करने वाले हैं? मुझ पर दया कीजिए!”

भगवान मुट्ठी छोड़कर मुस्कुराने लगे।

कुछ दिनों तक सुदामा जी वहीं रहे। कृष्ण और पटरानियों ने उनकी बहुत सेवा की।

अंत में श्रीकृष्ण ने अपने सखा को दूर तक पहुँचाकर विदा कर दिया।

सुदामा की धन की इच्छा नहीं थी। सखा की ब्राम्हण-भक्ति देखी। कहाँ तो मैं दरिद्र, पापी और कहाँ लक्ष्मी-संपन्न पुण्याचरित्र! हृदय से लगाया, पलंग पर बिठाया, चरण धोए, लक्ष्मीजी अवतार रुक्मिणी जी पंखा झलती रहीं!

श्रीकृष्ण कितने दयालु हैं — धन पाकर मतवाला हो जाएगा, इसलिए धन नहीं दिया। सिर्फ मेरा कल्याण ही चाहते हैं कृष्ण!

अंत का वैराग्य 

धन्य सुदामा! घर में भूखी स्त्री को छोड़ आए हैं। अन्न-वस्त्र का ठिकाना नहीं, पत्नी को जाकर क्या उत्तर देंगे — इसकी चिंता नहीं। सुदामा के मन में कोई कामना नहीं थी।

भक्तवांछाकल्पतरु भगवान ने विश्वकर्मा को भेजकर एक ही रात में उनके ग्राम को द्वारकापुरी जैसी भव्य नगरी बनवा दिया। झोपड़ी के स्थान पर मणिमय भवन खड़े हो गए थे।

जब सुदामा वहाँ पहुँचे, तब उन्हें यह नहीं जान पड़ा कि वह जागते हैं या स्वप्न देख रहे हैं। कहाँ मार्ग भूलकर पहुँच गए — वे यह भी समझ नहीं पाते थे।

इतने में बहुत से सेवकों ने उनका सत्कार किया। उनकी ब्राम्हणी अब किसी स्वर्ग की देवी जैसी हो गई थी। उसने सैकड़ों दासियों के साथ आकर उन्हें प्रणाम किया, घर में ले गई।

सुदामा जी विस्मित हो गए, पर पीछे सब रहस्य समझकर भाव-गदगद हो गए।

वे कहने लगे —
“मेरे सखा उदार चक्र-चूड़ामणि हैं। मांगने वाले को लज्जित न होना पड़े, इसलिए चुपचाप छिपाकर देते हैं। परंतु मुझे यह संपत्ति नहीं चाहिए!

जन्म-जन्म में उन सर्वागुणागार की विशुद्ध भक्ति में लगा रहूँ, यही मुझे अभीष्ट है।”

सुदामा वह ऐश्वर्य पाकर भी अनासक्त रहे। विषय-भोगों से चित्त को हटाकर भजन में ही वे सदा लगे रहे। इस प्रकार वे ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गए।

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