रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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🌸 रत्नाकर डाकू से ब्रह्मऋषि वाल्मीकि का दिव्य सफर 🌸
इनका जन्म अंगिरा गोत्र में हुआ था।
परंतु डाकुओं के साथ रहकर ये लूट-मार करने लगे।
हत्या करने लगे।
जंगल से जो भी निकलता, उसे लूट लेते और उसकी हत्या कर देते।
वर्षों तक ये इस क्रूर कार्य को करते रहे।
पर अब उनके उद्धार का समय आ गया था।
अचानक सामने से नारद जी आ निकले।
उन्हें देखते ही ये उन पर झपट पड़े।
डाकू रत्नाकर बोले —
“जो भी माल है निकाल दो, वरना जीवन से हाथ धोना पड़ेगा।”
नारद जी बोले —
“मेरे पास तो यह वीणा है, चाहो तो इसे ले लो, जान से क्यों मारते हो?”
रत्नाकर ने कहा —
“इसे बजाकर कुछ सुनाओ।”
नारद जी ने वीणा बजाकर सुनाया।
सुनते ही रत्नाकर के भाव कुछ बदल गए।
नारद जी बोले —
“तुम व्यर्थ जीवों की हत्या और हिंसा क्यों करते हो?”
रत्नाकर बोले —
“मेरा परिवार बहुत बड़ा है।
अगर ये सब कार्य नहीं करूंगा तो खाएंगे क्या?
मेरा परिवार मेरे सुख-दुख का साथी है,
उनका भरण-पोषण मुझे ही करना है।”
नारद जी बोले —
“अपने परिवार में पूछकर आओ कि क्या वे तुम्हारे इस पाप के सहभागी बनेंगे?”
रत्नाकर बोला —
“मैं जाऊँगा तो तुम भाग जाओगे।”
नारद जी के समझाने पर वह उन्हें रस्सी से एक पेड़ में बाँधकर घर चला गया।
घर जाकर उसने अपने परिवार और कुटुंबियों से पूछा।
वे बोले —
“हमारा पालन-पोषण तुम्हारी जिम्मेदारी है।
तुम जो मर्जी करो, पर हमें भोजन चाहिए।
हम तुम्हारे पाप में सहभागी नहीं बनेंगे।”
वापस आकर रत्नाकर ने नारद जी का बंधन खोल दिया
और उनके चरणों में गिर पड़े।
नारद जी के चरणों में गिरकर वे खूब जी भरकर रोए।
नारद जी बोले —
“अब तक जो हुआ, सो हुआ।
अब मैं तुम्हें ऐसा मंत्र दूँगा जिससे तुम्हारे सभी पाप धुल जाएंगे।”
नारद जी ने राम नाम जपने को कहा,
पर उनसे राम नाम बोला नहीं गया।
तब नारद जी ने बहुत सोच-विचार कर कहा —
“तुम ‘राम-राम’ उल्टा करके ‘मरा-मरा’ जपो।
निरंतर जपने से अपने आप राम-राम हो जाएगा।”
देवऋषि नारद जी का उपदेश पाकर
वे निरंतर “मरा-मरा” जपने लगे।
हजारों वर्षों तक वे एक ही स्थान पर बैठकर
नाम के रत्न में मग्न हो गए।
उनके पूरे शरीर पर दीमकों का पहाड़ बन गया।
दीमकों के घर को वाल्मीकि कहते हैं,
इसीलिए उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।
पहले इनका नाम रत्नाकर डाकू था।
बाद में यही संसार के आदि कवि बने।
इन्होंने वाल्मीकि रामायण की रचना की।
वनवास के समय भगवान श्रीराम इनके आश्रम में आए थे।
रामायण के अंतिम दिनों में
सीता माता इन्हीं के आश्रम में रहीं
और यहीं लव-कुश को जन्म दिया।
लव-कुश को रामायण का गायन
और शस्त्र विद्या
इन्होंने ही सिखाई थी।
इस प्रकार राम नाम के प्रभाव से
एक डाकू से ब्रह्मऋषि बन गए।
चौपाई
जान आदि कबि नाम प्रतापू
भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥
उलटा नाम जपत जगु जाना
बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना ॥
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