रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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पुराणों में वर्णित अजामिल की कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान का नाम🪔 अजामिल का प्रारम्भिक जीवन
अजामिल कन्नौज नगर का एक ब्राह्मण था। वह बचपन से ही अत्यंत संस्कारी, वेदों का ज्ञाता, माता-पिता का
आज्ञाकारी पुत्र और भगवान विष्णु का सच्चा भक्त था।उसका जीवन धर्म, सत्य और सदाचार से परिपूर्ण था।
समय का चक्र बदला और उसकी संगति बिगड़ गई।
एक दिन उसने एक कुलटा दासी को देखा और उसके मोह में पड़ गया।
धीरे-धीरे वह अधर्म के मार्ग पर चल पड़ा।
उसने उसी दासी को अपनी पत्नी बना लिया।
अब वह न्याय-अन्याय का विचार किए बिना जैसे भी धन प्राप्त होता, उसे लाकर उस स्त्री को दे देता।
उसने अपने माता-पिता और पूर्व पत्नी तक को त्याग दिया।
कुलटा दासी से उसकी कई संतानें हुईं।
पूर्व जन्म के पुण्य या किसी संत के उपदेश से उसने अपने सबसे छोटे पुत्र का नाम “नारायण” रख दिया।
वह अपने इस छोटे पुत्र से अत्यधिक प्रेम करता था।
उसी बालक में उसके प्राण बसते थे।
जब अजामिल की मृत्यु की घड़ी निकट आई,
तो यमराज के दूत उसे लेने आए।
भय और मोह में डूबा हुआ अजामिल ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगा—
“नारायण! नारायण!”
वह अपने पुत्र को पुकार रहा था,
परंतु यह नाम स्वयं भगवान विष्णु का था।
जैसे ही अजामिल के मुख से “नारायण” नाम निकला,
भगवान विष्णु के दूत वहाँ प्रकट हो गए।
उन्होंने यमदूतों को रोकते हुए कहा—
“जिसने एक बार भी भगवान का नाम लिया है,
वह पापों से मुक्त हो जाता है।”
यमदूतों को लौटना पड़ा।
भगवान के पार्षदों ने घोषणा की—
“इसने अंतिम समय में ‘नारायण’ नाम का उच्चारण किया है, अतः अब यह पापी नहीं रहा।”
जब यमदूतों ने यमराज को यह घटना बताई,
तब यमराज ने कहा
“अब से तुम केवल उसी पापी को लाना
जिसकी जीभ से कभी भगवान का नाम न निकला हो,
जिसने कभी भगवान की कथा न सुनी हो,
जिसके चरण कभी मंदिर में न पड़े हों,
और जिसने कभी भगवान के विग्रह की पूजा न की हो।”
✨ भगवान का नाम अनजाने में भी लिया जाए तो वह उद्धार करता है।
✨ अंत समय में नाम-स्मरण सबसे बड़ा सहारा है।
✨ सच्चे पश्चाताप और भक्ति से सबसे बड़ा पापी भी मुक्त हो सकता है।
✨ भगवान दयालु हैं — वे केवल भाव देखते हैं।
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