रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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🪔"भगवान की अनंत कृपा और भक्त की भक्ति का अद्भुत दृश्य। इस दिन श्री चतुर्भुज स्वामी के बाल
शुभ्र हो गए, और देवाजी पंडा का हृदय प्रेम और आशीर्वाद से भर गया।"🪔
🌸 श्री देवाजी पंडा की कथा – उदयपुर के चतुर्भुज स्वामी मंदिर🌺
उदयपुर के समीप चतुर्भुज स्वामी का मंदिर है। श्री देवाजी पंडा उसमे पुजारी थे। वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे परंतु
पूजा पाठ बड़े भक्ति भाव, श्रद्धा और विधि -विधान से करते थे।
एक दिन की बात है उदयपुर नरेश रात के समय मंदिर में आए। शयन आरती हो चुकी थी। भगवान को शयन
कराकर देवाजी ने भगवान के गले का पुष्पहार उतारकर अपने सिर पर रख लिया था और मंदिर बंद करके बाहर
आ रहे थे। इसी समय महाराणा वहाँ पहुँचे।
दरवाजे पर अकस्मात महाराणा को देखकर देवाजी घबरा कर मंदिर में घुस गए और उन्हें पहनाने के लिए भगवान
की माला ढूंढने लगे। उस दिन दूसरी माला नहीं थी, अतः महाराणा नाराज ना हो, इसलिए देवाजी ने मस्तक पर
रखा हुआ पुष्पहार उतारकर बाहर जाकर महाराणा के गले में पहना दिया।
कुछ सोचने का समय ही नहीं मिला। देवाजी के सिर के सारे बाल सफेद थे और बड़े-बड़े थे। 2–3 सफेद बाल माला
में लग गए और महाराणा के गले में आ गए।
महाराणा ने बालों को देखकर कहा = पुजारीजी मालूम होता है, भगवान के सारे बाल सफेद हो गए हैं।
देवाजी को कुछ सुझा नहीं और डरते-डरते बोले = हाँ महाराज, ठाकुरजी के सारे बाल सफेद हो गए हैं।
महाराणा को पुजारी के जवाब पर हंसी भी आई और क्रोध भी आया।
महाराणा गंभीर स्वर में बोले = मैं कल स्वयं आकर देखूँगा।
देवाजी पूजारी ने अचानक कह तो दिया पर अब उनको बड़ी चिंता हो गई। प्रातः महाराणा आएंगे और भगवान के
सफ़ेद बाल ना पाकर ना जाने क्या करेंगे। देवाजी की आँखों से नींद उड़ गई, खाना भी नहीं खाया। आँखों से
आँसुओं की धारा बह निकली।
देवाजी ने कहा मेरे स्वामी = मेरे मुंह से सहसा ऐसी बात निकल गई। तुम तो नित्य नव किशोर हो, तुम्हारे सफेद
बाल कैसे ?
सवेरे महाराणा आकर जब तुम्हारे काले बाल देखेंगे तो तुम्हारे इस सेवक की क्या स्थिति होगी, ना जाने क्या दंड देंगे
मुझे ?
यो कहकर देवाजी फफक -फफककर रो पड़े। इसी प्रकार भगवान को पुकारते पुकारते, रोते रोते कब रात बीत
गई पता ही नहीं चला।
प्रातः देवाजी ने नहा धोकर काँपते काँपते मंदिर के किवाड़ खोले। उनका हृदय भय के मारे धक-धक कर रहा था।
किवाड़ खोलते ही देखा = कल्याणमय कृपा कल्पतरु श्री विग्रह के समस्त केश शुभ्र [सफेद] हो चुके हैं।
देवाजी के हृदय की दशा विचित्र है = ये स्वप्न है या साक्षात ?
करुणा सिंधु की इस दीन वत्सलता को देखकर प्रेममग्न होकर देवाजी की बाह्य चेतना चली गई और वह बेसुध
होकर जमीन पर गिर पड़े।
बहुत देर के बाद उनकी समाधि टूटी। देवाजी की आँखों से प्रेम और आनंद के आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी।
🪷महाराणा का आगमन और पुजारी की मनोदशा 💥
इसी समय महाराणा का परीक्षा के लिए आगमन हुआ। देवाजी को व्याकुलता से रोता देखकर वे समझे कि रात को
मुझसे कह तो दिया था कि ठाकुरजी के सारे बाल सफेद हो गए हैं और अब भय के मारे रो रहा है।
इतने में ही उनकी नजर भगवान के श्री विग्रह पर पड़ी। देखकर महाराणा को बहुत आश्चर्य हुआ। श्याम सुंदर के
सारे बाल चाँदी की तरह चमक रहे हैं।
महाराणा ने समझा = अपनी बात रखने के लिए पुजारी ने कहीं से लाकर सफेद बाल चिपका दिए हैं। राणा ने परीक्षा
की सोची और भगवान का एक बाल बलपूर्वक तोड़ लिया।
राणा ने देखा बाल तोड़ते ही मानो श्री विग्रह को दर्द हुआ और नाक पर सिकुड़न आ गई। इतना ही नहीं, बाल तोड़ते
ही सिर से रक्त की बूंद निकली और राणा जी के अंगरखे पर आ पड़ी। राणा जी यह देखकर मूर्छित होकर जमीन
पर गिर पड़े।
🪷महाराणा की देवाजी से क्षमा याचना 💥
राणा की चेतना बहुत समय बाद वापस आई। महाराणा देवाजी पुजारी के चरनो मे गिर पड़े = प्रभु मैं नीच बुद्धि का
हूँ। मैंने बड़ा अपराध किया है। आप मुझे क्षमा कर दो। भक्त क्षमा-शील होते हैं। मुझे क्षमा कर दो प्रभु, आप मेरी
रक्षा कीजिए।
देवाजी ने रोते रोते महाराणा को अपने हृदय से लगा लिया और गद-गद होकर बोले = ये सब तो मेरे प्रभु की महिमा
है। मैं गंवार तो पेट का गुलाम था। भगवान की पूजा का तो नाम था, पर मेरे प्रभु कितने दयालु हैं। मेरी झूठी पूजा
पर भी इतने प्रसन्न हो गए, कि मुझ नालायक की बात को रखने के लिए अपने नित्य किशोर सुकुमार श्री विग्रह पर
श्वेत बालों की रचना कर डाली। मैं तो स्वयं अपराधी हूँ। मैंने झूठ बोलकर भगवान का अपराध किया था।
इतना कहकर देवाजी पुजारी और महाराणा दोनों ही भगवान की दयालुता को देखकर रोने लगे। वे दोनो कभी रोते
रोते भगवान की ओर देखते कभी एक दूसरे को, दोनो ही एक दूसरे से अपनी अपनी गलती की क्षमा मांगने लगे !
श्री चतुर्भुज महाराज ने आज्ञा दी = जो भी राजगद्दी पर बैठे वह दर्शनों के लिए मेरे मंदिर में ना आए।
तभी से भगवान की इस आज्ञा के अनुसार जो भी उदयपुर की राज गद्दी पर बैठते हैं, वे दर्शन करने चतुर्भुज मंदिर
में नहीं आते।
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