रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
" धर्म की बाते एक आध्यात्मिक ब्लॉग है जहां हम धर्म,आस्था,जीवन से जुड़े विचार,देवी देवताओ की कहानियाँ, व्रत, पूजा-पाठ की बातें सरल भाषा में सांझा करते है यह बिल्कुल साफ ,परफेक्ट और seo -friendly है " किसी भी साधन या नियम को अपनाने से पहले अपने गुरु या जानकार से परामर्श करें ,हम किसी भी प्रकार का दावा नही करते !
देवर्षि नारद जी सनातन धर्म के अत्यंत पूजनीय, प्रसिद्ध और दिव्य ऋषि माने जाते हैं। वे त्रिकालदर्शी, ब्रह्मर्षि तथा
भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके मुख से सदैव “नारायण–नारायण” का उच्चारण होता रहता था। नारद जी
देवताओं, मनुष्यों और असुरों—तीनों लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले ऋषि हैं।
उत्संगान्नारदो जज्ञे अर्थात प्रजापति ब्रह्माजी की गोद से नारद जी का जन्म हुआ।
जब ब्रह्माजी ने उन्हें सृष्टि के विस्तार की आज्ञा दी !
नारद जी ने कहा :-
“अमृत से भी अधिक प्रिय श्री विष्णु सेवा को छोड़कर कौन मूर्ख विषयों का विष पिएगा!”
इस पर ब्रह्माजी बहुत क्रोधित हो गए !
🔱 ब्रह्माजी का श्राप
ब्रह्माजी बोले :-
मेरे श्राप से तुम्हारे ज्ञान का लोप होगा।
तुम उपबर्हण नाम से प्रसिद्ध होकर पचास कन्याओं के पति बनोगे।
फिर दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे।
अंततः संत-भगवंत की कृपा से पुनः मेरे पुत्र रूप को प्राप्त करोगे।
ब्रह्माजी के श्राप से नारद जी उपबर्हण नामक गंधर्व बने और गंधर्वराज चित्ररथ की पचास कन्याओं से उनका
विवाह हुआ। योग क्रिया द्वारा गंधर्व शरीर त्याग कर उन्होंने द्रुमील गोप की पत्नी कलावती के गर्भ से जन्म लिया
और दासीपुत्र कहलाए। द्रुमील गोप के परलोक सिधारने के बाद, नारद जी अपनी माता के साथ एक सदाचारी
ब्राह्मण के घर सेवा करते हुए जीवन यापन करने लगे।
उस समय का वर्णन करते हुए स्वयं नारद जी कहते है
व्यासजी :-
“मैंने ब्राह्मण के घर चातुर्मास में संतों का संग किया। ब्राह्मण की आज्ञा से मैं अपनी माता के साथ
ब्राह्मणों की सेवा का कार्य करता और जीवन यापन करता रहा और उनके बर्तनों की झूठन ग्रहण
करता था। इससे मेरे पाप नष्ट हो गए, मन शुद्ध हो गया और भजन-पूजन में रुचि जागृत हो गई।”
जाते समय साधुओं ने उस शांत बालक को रूप-ध्यान और नाम-जप की आज्ञा दी।
कुछ समय बाद माता की सर्प के डसने से मृत्यु हो गई। नारद जी भगवान की खोज मे उत्तर दिशा की ओर चल
पड़े और एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करने लगे।
तभी उनके हृदय में भगवान प्रकट हुए—पर वह झाँकी बिजली की तरह आई और चली गई।
भगवान ने कहा—“इस जन्म में तुम मेरे दर्शन नहीं कर पाओगे।”
इसके पश्चात नारद जी भगवान का गुणगान करते हुए विचरण करते रहे और देह त्याग दी।
🌺 पुनर्जन्म और देवर्षि पद
दूसरे कल्प में नारद जी पुनः ब्रह्माजी के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए और देवर्षि कहलाए। नारद जी कहते है व्यासजी
अब तो जब भी वीणा बजाकर भगवान का स्मरण करता हूँ भगवान प्रकट हो जाते हैं।
🌼 भक्ति प्रचार और वृंदावन मे प्रतिज्ञा
भक्ति प्रचार का श्रेय देवर्षि नारद जी को जाता है।
नारदजी ने भक्ति देवी और उनके दोनो पुत्र ज्ञान और वैराग्य के कष्ट दूर करने के लिए
वृंदावन में प्रतिज्ञा की—
“हे भक्ति देवी! कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है।
यदि मैं घर-घर तुम्हारी स्थापना न करूँ,
तो मुझे हरिदास न कहा जाए।”
🌺 ध्रुव और प्रह्लाद के लिए भक्ति देवी का उपदेश
भक्ति देवी ने कहा :-नारद जी आपको कोटि कोटि नमन !
आपके एक उपदेश ने बालक ध्रुव और बालक प्रह्लाद को भक्ति और माया पर विजय प्राप्त करवा दी,और ब्रम्ह
पद दिला दिया !
🌹 भक्ति देवी का आशीर्वाद
भक्ति देवी ने कहा—
देवर्षि, तुम धन्य हो। ब्रह्मपुत्र, तुम्हें नमस्कार है।
नारद जी आप देवर्षि, वेदान्त, योग, ज्योतिष, संगीत और भक्ति के प्रख्यात आचार्य हैं।
📜 श्लोक
जयति जगती मायां यस्यकायाधवस्ते |
वचनरचनमेकं केवलं चाकलस्य ||
ध्रुवपदमपि यातो यत्कृपातो ध्रुवोयं |
सकलकुशलपात्रं ब्रह्मपुत्रं नतास्मि ||
🌼 निष्कर्ष
ज्योतिष, वैद्यक, संगीत और भक्ति के महान आचार्य हैं।
उनके जीवन से सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति, ज्ञान और सेवा ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है।
राधे राधे 🌷
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें