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                                                                                                                                           श्री गणेशाय नमः                                                                 श्रीजानकीवल्लभो विजयते                                                                      ...

रघुकुल रीति सदा चली आई : प्राण जाए पर वचन ना जाए

महाराज रघु सिंहासन पर बैठे हैं, उनके सामने ऋषि पुत्र याचक के रूप में खड़ा है कोषाध्यक्ष राजा के बगल में खड़ा है ऊंटों पर सुवर्ण मुद्राएँ भरी हुई हैं, जिन्हें ऋषि पुत्र को देने के लिए लाया गया है दरबार में प्रजा मौजूद है, शाही और दिव्य वातावरण में

🪔 रघुकुल का प्रसिद्ध वाक्य 🪔

“रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन ना जाई”

💥सूर्यवंश के प्रसिद्ध राजा  

सूर्यवंश मे इक्षवाकु,अजमीढ़ आदि राजा बहुत प्रसिद्ध हुए है |

इसी तरह महाराज रघु भी बड़े प्रसिद्ध, पराक्रमी, धर्मात्मा, भगवान के भक्त और पवित्र हुए है |

💥रघुवंश का गौरव 

इन्ही के नाम से रघुवंश प्रसिद्ध हुआ इसीलिए भगवान श्री रामचंद्रजी के 

रघुवर, राघव, रघुपति, रघुवंशविभूषण, रघुनाथ आदि नाम हुए है |

💥महाराज रघु का परा क्रम 

महाराज रघु बड़े धर्मात्मा थे | इन्होंने अपने पराक्रम से समस्त पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था |

महाराज रघु चारों दिशाओ के एकछत्र सम्राट हुए है |

ये अपनी प्रजा को कभी कष्ट नहीं देते थे कर भी कम ही वसूलते थे | 

अन्य राजाओ को अपने अधीन बनाकर छोड़ देते थे उनसे कर नहीं लेते थे |

💥ऋषि पुत्र  का आगमन 

एक बार इनके दरबार मे कोत्स नामक एक ऋषि पुत्र आए | तब इन्होंने उनका बहुत सत्कार किया, चरण धोए |

ऋषि पुत्र ने आतिथ्य स्वीकार किया, कुशल पूछा ओर चलने लगे |

तब राजा ने कहा की आप बिना कोई बात किए क्यों जा रहे है ? आपके आने का क्या प्रयोजन है ?

ऋषिपुत्र बोले मैंने स्वयं देख लिया की आपने अपना सब कुछ दान कर दिया है, अब मुझे देने के लिए आपके पास कुछ बचा ही नहीं, तो मै आपसे क्या कहूँ ?

💥महाराज रघु का उत्तर 

महाराज रघु ने कहा : नहीं ब्रम्हण |

आप अपना अभिप्राय बताएं, मै उसे पूरा करने का प्रयास अवश्य करूंगा |

ऋषिपुत्र बोले : मैंने अपने गुरु से वेदों की शिक्षा ली |

शिक्षा के अंत मे मैंने अपने गुरुजी से दक्षिणा के लिए प्रार्थना की |

 तो वे बोले : मै तुम्हारी सेवा से ही संतुष्ट हूँ | मुझे और कुछ दक्षिणा नहीं चाहिए |   

पर मेरे बार-बार आग्रह करने पर वे झल्ला कर बोले : अच्छा तो मुझे चौदह लाख सुवर्ण मुद्राएं लाकर दो |

मै  इसीलिए आपके पास आया था, महाराज |

💥महाराज रघु की उदारता 

राजा रघु ने कहा : मेरे हाथों मे धनुष-बाण रहते हुए कोई विद्वान ब्रम्हण मेरे द्वार से खाली हाथ जाए, तो धिक्कार है |

राजपाट और धन वैभव को |

आप बैठिए ब्रम्हण,  मै कुबेरलोक पर चढ़ाई करके धन लाकर आपको दूंगा |

महाराज ने सेना तैयार की, ओर कहा, हम कल सुबह कुबेरलोक पर चढ़ाई करेंगे |

💥सुवर्ण की वर्षा 

प्रातःकाल कोष अध्यक्ष ने आकर कहा : महाराज |

 कल रात सुवर्ण की वर्षा हुई थी, कोष सुवर्ण मुद्राओ से भरा हुआ है |

महाराज ने स्वयं आकर देखा, सर्वत्र चारों ओर स्वर्ण मुद्राएँ भरी पड़ी है |

महाराज रघु ने ऊंटों पर लदवाकर सभी सुवर्ण मुद्राएँ ऋषिपुत्र को देनी चाही पर, 

ऋषिपुत्र ने कहा : महाराज मुझे सिर्फ चौदह लाख ही चाहिए , ये तो बहुत अधिक है |

महाराज बोले : ब्रम्हण |

ये सब आपके निमित्त ही आई है, अतः अब आप ही इसके अधिकारी है, आपको लेनी ही होगी |

आपके निमित्त आए धन को भला मै कैसे रख सकता हूँ | 

ऋषि पुत्र ने बहुत मना किया, किन्तु महाराज नहीं माने |

ऋषिपुत्र को जितनी सुवर्ण मुद्रा लेनी थी वे लेकर अपने गुरु के यहाँ चले गए, बाकी सभी सुवर्ण मुद्राएँ महाराज ने ब्रम्हणो मे लुटा दीं | 

💥महाराज रघु का तपस्या मार्ग 

ऐसा दाता समस्त पृथ्वी पर दूसरा कौन होगा , जो अपने याचकों के मनोरथों को पूरा करें |

अंत मे महाराज रघु अपने पुत्र अज को राज्य देकर तपस्या करने चले गए |

अज के पुत्र महाराज दशरथ हुए, जिन्हे साक्षात परब्रम्ह परमात्मा श्री रामचन्द्र के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |

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