Lord Prithu: A Vishnu Avatar
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महाराज अंग की पत्नी सुनीथा, जो साक्षात मृत्यु की कन्या थीं, उनसे वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। अपने नाना मृत्यु के स्वभाव का अनुसरण करने के कारण वेन अत्यन्त दुष्टकर्मी बन गया। उसकी दुष्टता से दुःखी होकर राजर्षि अंग नगर छोड़कर चले गये।
राजा के अभाव में राज्य में अराजकता न फैल जाए, इसलिए ऋषियों ने और कोई उपाय न देखकर वेन को राजा बना दिया। किन्तु राज्य पाकर वेन अत्यन्त उन्मत्त हो गया। वह धर्म और धर्मात्मा पुरुषों के विनाश में लग गया। ऋषियों ने उसे बहुत समझाया, परन्तु वह उनकी बात न मानकर उनकी अवहेलना करने लगा। तब क्रोधित ऋषियों ने हुंकार मात्र से वेन का वध कर दिया।
🌾 2. निषाद और पृथु का दिव्य प्राकट्य
किन्तु राजा के न रहने के कारण प्रजा को लुटेरों से बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर ऋषियों ने वेन के शरीर का मन्थन किया। पहले उसकी जाँघों का मन्थन किया गया। उससे एक बौना, कुरूप और काले वर्ण का पुरुष उत्पन्न हुआ। जब उसने पूछा, “मैं क्या करूँ?” तब ऋषियों ने कहा— “निषीद” (बैठ जा)। इसी कारण वह निषाद कहलाया।
इसके बाद ऋषियों ने वेन की भुजाओं का मन्थन किया। तब एक दिव्य स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ऋषियों ने पुरुष का नाम पृथु और स्त्री का नाम अर्चि रखा।
ऋषि-ब्राह्मणों ने पृथुजी के हाथों में बिना किसी रेखा के बना हुआ चक्र का चिह्न तथा चरणों में कमल के चिह्न देखकर अत्यन्त हर्ष किया। उन्होंने समझ लिया कि संसार की रक्षा के लिए साक्षात भगवान विष्णु ने पृथु के रूप में अवतार लिया है और अर्चि के रूप में भगवान की सेवा में सदा रहने वाली श्रीलक्ष्मीजी प्रकट हुई हैं।
सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से अलंकृत महाराज पृथु का विधिपूर्वक राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेक आभूषणों से सजी हुई महारानी अर्चि उनके साथ शोभा पा रही थीं। सभी लोगों ने उन्हें तरह-तरह के उपहार भेंट किये। इसके पश्चात सूत, मागध और बन्दीजनों ने उनकी स्तुति की तथा ब्राह्मणों ने पृथुजी को प्रजा का रक्षक घोषित किया।
👑 3. पृथ्वी का दुख और पृथु का करुण क्रोध
राजा वेन के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी ने समस्त औषधियों और अन्न के बीजों को अपने भीतर छिपा लिया था। बहुत समय बीत जाने के कारण वे औषधियाँ पृथ्वी के गर्भ में जीर्ण हो गई थीं। जब महाराज पृथु का राज्य स्थापित हुआ, तब भी पृथ्वी अन्न उत्पन्न नहीं कर रही थी। फलस्वरूप प्रजा भूख से अत्यन्त दुःखी हो गई और उनके शरीर सूखकर दुर्बल होने लगे।
तब प्रजा ने महाराज पृथु के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। प्रजा का दुःख सुनकर पृथुजी क्रोधित हो उठे और पृथ्वी को दण्ड देने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लिया। पृथ्वी भयभीत होकर गाय का रूप धारण करके भागी, परन्तु कहीं भी उसे बचने का उपाय नहीं मिला। अन्त में वह महाराज पृथु की शरण में आ गई।
तब पृथुजी ने गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन किया, जिससे पुनः अन्न, बीज और औषधियाँ प्रकट हो गईं। इसके बाद प्रजा सुख और शान्ति से रहने लगी।
🔥 4. यज्ञ और देवताओं का संघर्ष
परम धर्मात्मा महाराज पृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया। जब निन्यानवे यज्ञ पूर्ण हो गये और सौवें यज्ञ का आरम्भ हुआ, तब देवराज इन्द्र को अपना पद छिन जाने का भय हुआ। इसलिए उन्होंने यज्ञ में अनेक विघ्न उत्पन्न किए।
इससे क्रोधित होकर पृथुजी इन्द्र का वध करने के लिए तैयार हो गये। याजकों ने भी अपने मन्त्रबल से इन्द्र को यज्ञाग्नि में खींचकर भस्म कर देने का निश्चय किया। उसी समय ब्रह्माजी वहाँ आए और उन्होंने सबको समझाकर रोक दिया। उन्होंने पृथुजी को सौवें यज्ञ का आग्रह छोड़कर इन्द्र से सन्धि करने की सलाह दी।
🙏 5. भक्ति का चरम और मोक्ष भगवान विष्णु प्रकट हुए ✨
महाराज पृथु ने ब्रह्माजी की आज्ञा स्वीकार कर ली। उनके निन्यानवे यज्ञों से ही यज्ञपति भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे इन्द्र को साथ लेकर पृथुजी के सामने प्रकट हुए। अपने कर्मों से लज्जित इन्द्र पृथुजी के चरणों में गिरना चाहते थे, किन्तु पृथुजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया।
भगवान विष्णु के दर्शन करके पृथुजी प्रेम और आनन्द से भर गये। उनकी आँखों में प्रेमाश्रु छलक आए, शरीर रोमांचित हो उठा और हृदय आनन्द-सागर में डूब गया। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की। तब भगवान ने उनके गुणों की प्रशंसा करते हुए उनसे वर माँगने के लिए कहा।
भगवान के वर माँगने पर महाराज पृथु ने अत्यन्त विनम्रता से कहा—
“हे नाथ! मुझे ऐसा कोई वर नहीं चाहिए जहाँ आपके चरणकमलों की महिमा का श्रवण न हो। मुझे तो उस मोक्ष की भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषों के मुख से आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख न मिले। मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान प्रदान करें, जिससे मैं निरन्तर आपके लीला-गुणों का श्रवण करता रहूँ।”
महाराज पृथु की इस अनन्य भक्ति और प्रार्थना से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें अपनी भक्ति का वरदान दिया और फिर अन्तर्धान हो गए।
इसके बाद महाराज पृथु ने बहुत समय तक धर्मपूर्वक पृथ्वी और प्रजा का पालन किया। जब उन्हें लगा कि अब जीवन का अन्तिम पुरुषार्थ, अर्थात् मोक्ष प्राप्त करने का समय आ गया है, तब उन्होंने सनकादि कुमारों के उपदेशों को स्मरण किया।
उन्होंने पृथ्वी का भार अपने पुत्रों को सौंप दिया और अपनी पत्नी महारानी अर्चि के साथ वन में तपस्या करने चले गए। वहाँ उन्होंने सनत्कुमार द्वारा बताए गए परम अध्यात्मयोग का अभ्यास किया और भगवान श्रीहरि की आराधना में लग गए।
अन्त में भगवान के चरणकमलों का चिन्तन करते-करते महाराज पृथु ब्रह्मस्वरूप में लीन हो गए। जब महारानी अर्चि ने यह देखा, तब उन्होंने भी अपने पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए अपने पति का अनुसरण किया।
मुझे तो उस मोक्षपद की भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषों के हृदय से उनके मुख द्वारा निकला हुआ आपके चरण-कमलों का मकरन्द नहीं है, जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख नहीं मिलता है। इसलिए मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीला-गुणों को सुनता ही रहूँ।"
इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान ने उनको अपनी भक्ति का वर प्रदान किया और भगवान अन्तर्धान हो गये।
बहुत काल तक धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने के बाद श्रीपृथुजी ने सनत्कुमारजी के उपदेशों का स्मरण किया कि—
"अब मुझे अन्तिम पुरुषार्थ मोक्ष के लिये प्रयत्न करना चाहिये।"
उन्होंने पृथ्वी का भार अपने पुत्रों को सौंप दिया और अपनी पत्नी सहित तपोवन को चले गये। वहाँ जाकर भगवान सनत्कुमार ने जिस परमोत्कृष्ट अध्यात्मयोग की शिक्षा दी थी, उसी के अनुसार पुरुषोत्तम श्रीहरि की आराधना करने लगे।
अन्त में भगवान के श्रीचरण-कमलों का चिन्तन करते हुए वे ब्रह्मस्वरूप में लीन हो गये। यह देखकर महाराज पृथु की पतिव्रता पत्नी अर्चि ने चिता बनायी और अपने पति के साथ सती हो गयीं।
परम साध्वी अर्चि को इस प्रकार अपने पति वीरवर पृथु का अनुसरण करते देखकर सहस्रों वरवर्णिनी देवियों ने अपने-अपने पतियों के साथ उनकी स्तुति की। वहाँ देवताओं के बाजे बजने लगे और देवांगनाओं ने पुष्प-वृष्टि की।
राजवृत्तिं राजा यः स्वनाम सफलीकृतः।
दुदोह वसुधां बीजं तस्मै श्रीपृथवे नमः॥
भावार्थ:
जिस राजा ने अपने नाम को सार्थक करते हुए पृथ्वी (वसुधा) से बीज, अन्न और सम्पत्ति का दोहन कर प्रजा का पालन किया, उन महाराज श्रीपृथु को नमस्कार है। हमारा यूट्यूब चैनल फॉलो करें
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