रामचरितमानस बालकाण्ड मंगलाचरण
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🪔 जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम॥1॥
🪔जटाकटाह सम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥2॥
🪔 धराधरेन्द्रनन्दिनी विलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्तति प्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥3॥
🪔 जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिंधुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतंबिभर्तु भूतभर्तरि॥4॥
🪔 सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥5॥
🪔 ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥6॥
🪔करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनन्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥7॥
🪔 नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धर:।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥8॥
🪔 प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दली रुचिप्रबद्धकन्धरम।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥9॥
🪔अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥10॥
🪔जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमभ्दुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट |
धिमिद्धिमिद्धिमिद्धवनन्म्रदगतुन्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डव: शिव: ||11 ||
🪔 दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयो: सुह्रद्विपक्षपक्षयो: |
तृणारविन्दचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो:
समप्रव्रत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ||12 ||
🪔कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन
विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमञ्जलीम वहन |
विलोललोललोचनों ललामभाललग्नक:
शिवेति मंत्रमुच्चरन कदा सुखी भवाम्यहम ||13 ||
🪔इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम ||14 ||
🪔 पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
य: शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरन्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शंभु: ||15 ||
इति शिवताण्डवस्तोत्रं यः पठेत शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
रावण द्वारा गाया गया शिव तांडव स्तोत्रं सम्पूर्णम
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ॐ नमः शिवाय
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